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कमाल करते हो पांडे जी, कहां गए बुक्ड सीटों के दर्शक !


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फ़िल्म – दबंग-2, जोनर – एक्शन कॉमेडी, कलाकार – सलमान ख़ान, सोनाक्षी सिन्हा, प्रकाश राज, विनोद खन्ना, अरबाज़ ख़ान, निकितन धीर, दीपक डोबरियाल, मनोज पाहवा, संदीपा धर आदि, टीनू आनंद और माही गिल गेस्ट अपीयरेंस में, निर्देशक – अरबाज़ ख़ान, बैनर – एके प्रोडक्शंस, वरडिक्ट : **1/2

थिएटर : फेम, मलाड, स्क्रीन – 4

शो टाइम : 8.35 pm

दर्शक : 3/4 कुर्सियां खाली

कुछ यही तस्वीर थी शुक्रवार को रिलीज़ हुई फ़िल्म दबंग-2 के एक शो की । शुक्रवार की सुबह ये सोचकर शोज़ की पड़ताल की, कि चुलबुल पांडे को देखने के लिए मारामारी मची होगी । शायद ही किसी थिएटर में सीट मिले । जब इस थिएटर को खंगालना शुरू किया, तो सिल्वर क्लास ( A,B,C rows ) लगभग पूरा बुक था, लिहाज़ा  D Row में मैंने अपने लिए एक सीट बुक करवाई । सोचा शाम तक शो का टाइम होते-होते पूरा थिएटर खचाखच मिलेगा, पर थिएटर के अंदर का हाल मेरी सोच के एकदम उलट था । मैं जिस Rowमें बैठा था, वो तो खाली रही ही, साथ ही क़रीब 120 सीटों वाली स्क्रीन-4 की 1/4 सीटें भी पूरी ना भर सकीं । ये हाल था साल 2012 की मोस्ट एंटिसिपेटिड और अवेटिड फ़िल्म दबंग-2 का, वो भी उस दिन जब फ़िल्म रिलीज़ हुई हो । थिएटर में बुक्ड सीटों को खाली देखकर ज़हन में ये ख्याल भी आया, कि इसके पीछे प्रोड्यूसर अरबाज़ ख़ान का दिमाग तो नहीं ? आजकल बॉलीवुड में ये रिवाज़ है, कि रिलीज़ डे पर कलेक्शन बढ़ाने के लिए ख़ुद प्रोड्यूसर थिएटर्स में सीटें बुक करवा लेते हैं । ख़ैर, सच्चाई जो भी हो, लेकिन थिएयर में खाली पड़ी सीटों ने दबंग-2 के बारे में बहुत कुछ कह दिया । हो सकता है, कि शनिवार और रविवार को ये खाली पड़ी सीटें वाकई भर जाएं, लेकिन शुक्रवार को खाली रही सीटें साफ कह रही थीं, कि चुलबुल पांडे का स्वागत ज़ोरदार तरीक़े से नहीं किया गया ।

वैसे, दबंग-2 में कुछ ऐसा है भी नहीं, कि चुलबुल पांडे का स्वागत ज़ोरशोर से किया जाए । असाधारण एक्शन दृश्यों वाली बहुत ही साधारण फ़िल्म है दबंग -2 । अगर फ़िल्म की स्टार वैल्यू निकाल दी जाए, तो दबंग-2 में कुछ नहीं बचता । कहानी शुरू होती है, कानपुर के थाना बजरिया में हुए एक किडनैपिंग केस से । सीमेंट व्यवसायी का बच्चा किडनैप कर लिया जाता है । बच्चे को छुड़ाने के लिए चुलबुल पांडे की एंट्री होती है । 70 के दशक की फ़िल्मों की तरह बच्चे को लेकर एक बंद गोदाम में पहुंचते हैं बदमाश । ऐसा लगता है, कि अभी दीवार को वो सीन शुरू हो जाएगा, जिसमें अमिताभ बच्चन अकेले गोदाम के अंदर जाते हैं, और अपने हाथ से ताला बंद करके चाबी गुंडों को दे देते हैं । मगर, ये सीन नहीं होता, और चुलबुल की एंट्री कहीं और से दीवार तोड़ते हुए होती है । क़रीब 3-4 मिनट की धुआंधार फाइट सिक्वेंस के बाद फ़िल्म चुलबुल की निजी जि़ंदगी और नौकरी के बीच डोलती रहती है । बीच-बीच में विलेन बच्चा सिंह यानि प्रकाश राज, पापा प्रजापति पांडे यानि विनोद खन्ना, मक्खी यानि अरबाज़ ख़ान का ट्रैक चलता रहता है । फ़िल्म में टर्निंग प्वाइंट उस वक़्त आता है, जब बच्चा का भाई गेंदा ( दीपक डोबरियाल ) एक लड़की को शादी के मंडप से उठाकर ले जाना चाहता है । इस सीन को देखकर गंगाजल की याद आ जाती है, जिसमें यशपाल शर्मा का करेक्टर एक लड़की के लिए ऑबसेस्ड होता है, और उसे शादी के मंडप से उठाकर ले जाता है । ख़ैर, चुलबुल वहां आ जाता है, और गेंदा को मार डालता है । भाई की मौत का बदला लेने के लिए बच्चा चुलबुल की गर्भवती पत्नी और भाई मक्खी पर हमला बोलता है, जिससे चुलबुल की बीवी का गर्भपात हो जाता है । इसका बदला लेने के लिए चुलबुल अकेला प्रकाश राज से भिड़ने पहुंच जाता है, जहां वो पहले उसके गुंडों से लड़ता है । फिर बच्चा के भाई चुन्नी ( निकितन धीर ) से दो-दो हाथ करता है, और फाइनली बच्चा को मार डालता है ।

दबंग -2 की सबसे बड़ी प्रॉब्लम है,  हीरोइज़्म की कमी । फ़िल्म के लीड एक्टर सलमान ख़ान के ज़रिए मैचोइज़्म तो भर-भर के दिखाया गया है, लेकिन चुलबुल पांडे के करेक्टर में हीरोइज़्म नहीं है । क्योंकि वो शुरू से ही इतना पॉवरफुल है, जिसके सामने कोई भी मुश्किल खड़ी नहीं रह सकती । अगर उन हिंदी फ़िल्मों की कहानियों पर गौर करें, जिनमें रिवेंज स्टोरीज दिखाई जाती रही हैं, तो ऐसी फ़िल्मों में हीरो को पहले कमज़ोर दिखाया जाता है, विलेन उस पर अत्याचार करता है, उसके ज़ुल्मो-सितम से हीरो टूट जाता है, लेकिन टूटकर वो फिर जुड़ता है, विलेन के ख़िलाफ़ खड़ा होता है, और आख़िरकार उससे जीतता है । मिसाल के तौर पर, अरबाज़ और सलमान ख़ान के पापा सलीम ख़ान की फ़िल्म ज़ंजीर ही देख लीजिए । इंसपेक्टर विजय खन्ना के क़िरदार को एग्रेसिव और पॉवरफुल तो दिखाया, लेकिन इतना भी नहीं, कि विलेन उसके सामने जोकर लगने लगे । ज़ंजीर का विलेन उसके सामने तरह-तरह की चुनौतियां खड़ी करता है । एक वक़्त ऐसा आता है, कि लगता है हीरो हार गया है, लेकिन विजय सारी परेशानियों को जीतकर विलेन को उसके अंजाम तक पहुंचाता है । वहीं चुलबुल पांडे के क़िरदार को देखें, तो वो इतना ताक़तवर है, कि विलेन उसके सामने बौना लगता है । दर्शक भी जब फ़िल्म देख रहा होता है, तो उसके ज़हन में यही बात रहती है, कि ये चुलबुल का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा । ज़ाहिर है, कि हीरो के इतने पॉवरफुल करेक्टर की वजह से फ़िल्म में वो रोमांच ख़त्म हो जाता है, जो हीरो और विलेन के टकराव से पैदा होता है । नतीजा ये होता है, कि फ़िल्म में मैचोइज़्म तो देखने को मिलता है, लेकिन हीरोइज़्म नहीं रहता ।

दबंग-2 को देखकर साफ पता चलता है, कि फ़िल्म को दबंग से हुए ज़बरदस्त मुनाफ़े को फिर से कैश करने और अरबाज़ को डायरेक्टर की टोपी पहनाने के लिए बनाया गया है । अरबाज़ ने भी बतौर निर्देशक अभिनव कश्यप की लीगेसी को आगे बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं किया । यहां तक कि फ़िल्म में गानों का नेचर और प्लेसिंग बिल्कुल दबंग की तरह ही है । कुल मिलाकर दबंग 2 सलमान की फ़िल्म है, और सलमान के फैंस के लिए ही है । बाक़ी लोगों को फ़िल्म देखकर हंसी तो आएगी, लेकिन ये हंसी फ़िल्म के ग्रेविटी डिफाइंग एक्शन को देखकर और बचकाने गैग्स को लिखने वाले की अक्ल पर आएगी ।

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