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Feature

रूह की (त)लाश


आमिर ख़ान की फ़िल्म तलाश फाइनली शुक्रवार को रिलीज़ हो गई । 2009 की फ़िल्म 3 ईडियट्स के बाद यूं तो आमिर ख़ान की दो फ़िल्में आ चुकी हैं । धोबी घाट और देहली बेली । धोबी घाट में आमिर ने लीड रोल प्ले किया था, लेकिन उस फ़िल्म को उन्होंने ख़ुद ही मेनस्ट्रीम सिनेमा मानने से इंकार कर दिया था, जबकि देहली बेली में आमिर ने अपने भांजे इमरान को खुलकर खेलने का मौक़ा दिया, और ख़ुद को एक गाने और प्रमोशंस तक ही सीमित रखा । यानि सही मायनों में तलाश आमिर की फ़िल्म है, जिसे मेनस्ट्रीम सिनेमा की उसी केटेगरी में रखा जा सकता है, जिसमें 3 ईडियट्स थी । इसका मतलब ये हुआ, कि आमिर की फ़िल्म तीन साल बाद थिएटर्स में उतरी है, और यही वजह है, कि फ़िल्म को लेकर काफी शोर मचा हुआ था । लोगों के मन में ख़्याल था, कि तलाश उनकी पिछली कुछ फ़िल्मों गजनी और 3 ईडियट्स की तरह ही एंटरटेनिंग होगी, पर तलाश क्या वाकई एंटरटेनिंग है ?

फ़िल्म में आमिर ख़ान ने निभाई एक ऐसे पुलिस ऑफिसर सुरजन शेखावत की भूमिका, जिसकी पर्सनल लाइफ पटरी से उतरी हुई है । अपने बेटे की मौत के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार मानते हुए वो अपने-आप से ही जूझ रहा है । ऐसे में सुलझाने के लिए उसे मिलता है एक हाईप्रोफाइल एक्सीडेंट केस । इस केस को सुलझाते-सुलझाते सुरजन अपनी पर्सनल लाइफ की गुत्थियां भी सुलझा लेता है । फ़िल्म जब ख़त्म होती है, तो सुरजन को सारे सवालों के जवाब मिल चुके होते हैं, लेकिन मेरे मन में कई सवाल उठने लगते हैं । बिल्कुल फ़िल्म की टैग लाइन – The Truth Lies Within की तरह । मेरा पहला सवाल है, कि तलाश की कहानी में आख़िर नया क्या है ? फ़िल्म में जो भी एक्सीडेंट होते दिखाए गए हैं, उनके पीछे होती है एक आत्मा ( करीना कपूर ), जो दुर्घटना में हुई अपनी मौत के लिए ज़िम्मेदार लोगों को ठिकाने लगाने में लगी हुई है, और बदले के इसी मिशन के तहत उसे मिलता है सुरजन शेखावत, जो ‘प्रॉस्टिट्यूट आत्मा’ की तरफ आकर्षित होता है, लेकिन सेक्स करने के लिए नहीं, सिर्फ़ टाइम पास करने के लिए, क्योंकि उसकी रहस्मयी बातें सुरजन को सुकून देती हैं । कुल मिलाकर कहानी एक आत्मा के बदले की है, जो एक्सीडेंट केस में हो रही मौतों के केस को सॉल्व करने में सुरजन को सुराग-दर-सुराग देती है ।

हिंदी सिनेमा का हर कट्टर दर्शक जानता है, कि आत्मा के बदले की कहानी पर ना जाने कितनी सस्पेंस थ्रिलर और सीरियल्स बन चुके हैं । कुछ में आत्मा ख़ुद लोगों को मारती है, कुछ में वो किसी दूसरे पर सवार होकर बदला लेती है, कुछ में वो अपने क़ातिलों को इतना परेशान कर देती है, कि वो आत्म हत्या कर लेते हैं, और कुछ में वो फ़िल्म के हीरो को उसके क़ातिलों तक पहुंचने में मदद करती है । फ़िल्म के क्लाइमेक्स में आमिर को आत्मा के कंकाल का अंतिम संस्कार करते हुए भी दिखाया गया है । यानि आमिर की तलाश हॉरर फ़िल्मों के पुराने घिसे-पिटे फॉर्मूले पर बेस्ड है । मेरा दूसरा और सबसे अहम सवाल है फ़िल्म का क्लाइमेक्स । फ़िल्म के हीरो सुरजन शेखावत को आत्माओं की मौजूदगी और उनसे बात करने जैसे मुद्दों पर यक़ीन करते हुए दिखाया गया है, जिसका वो शुरू से विरोध करता रहा है । यहां तक कि जब उसकी पत्नी ( रानी मुखर्जी ) उसे अपने बेटे की आत्मा से बातचीत करने के लिए कहती है, तो वो उस पर बुरी तरह भड़कता है, और उस महिला को भी डांटता है, जो उसकी पत्नी की बात उसके बेटे की आत्मा से करवा रही थी । मगर, जब फ़िल्म के क्लाइमेक्स में उसे पता चलता है, कि अभी तक वो जिसे एक प्रॉस्टिट्यूट समझ रहा था, वो दरअसल एक आत्मा थी, तो उसकी सोच बदल जाती है ।

फ़िल्म इसी संदेश के साथ ख़त्म होती है, कि आत्माएं होती हैं, और बुलाने पर वो आकर बात भी करती हैं । मुझे सबसे ज़्यादा इसी बात ने परेशान किया, कि तलाश का ये संदेश आमिर ख़ान की तरफ से आया है । वही आमिर ख़ान जो सत्यमेव जयते जैसे शो के ज़रिए सामाजिक अंधविश्वासों और कुरीतियों की ख़िलाफ़त करते रहे हैं । तलाश में सस्पेंस तो है, लेकिन थ्रिल और हॉरर बिल्कुल नहीं । हालांकि जब ये सस्पेंस खुलता है, तो खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली फीलिंग आती है । तलाश की सबसे बड़ी दिक्कत यही है, कि इस कहानी में जो क़िरदार हैं, उनमें आमिर ख़ान जैसे सेंसीबल एक्टर की ज़रूरत बिल्कुल नहीं थी । फ़िल्म में आमिर के जूनियर पुलिस ऑफिसर बने राजकुमार यादव को भी अगर लीड रोल में लिया जाता, तो भी फ़िल्म जो है वही रहती । आमिर जैसी पर्सनैलिटी का फ़िल्म में कोई कांट्रिब्यूशन नहीं है, और ना ही फ़िल्म की दो लीडिंग लेडीज़ का । उनकी जगह भी कोई भी एक्ट्रेस फिट हो सकती थी ।

कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर लगता है, कि अगर इसमें से फलां एक्टर को माइनस कर दिया जाए, तो फ़िल्म पटरी से उतर जाएगी । दबंग में सलमान ख़ान का करेक्टर ऐसा ही है । चुलबुल पांडेय के क़िरदार में किसी दूसरे एक्टर को रखकर फ़िल्म की कल्पना कीजिए, आपको फ़िल्म बिखरती हुई दिखाई देगी । या आमिर की ही फ़िल्म 3 ईडियट्स में रणछोड़ दास शामलदास छांछड़ के क़िरदार में आपको कोई दूसरा एक्टर फिट होता नज़र नहीं आएगा । मेकिंग के लिहाज़ से तलाश अच्छी फ़िल्म हो सकती है, लेकिन आमिर ख़ान जैसे एक्टर के नज़रिए से नहीं । आमिर जब फ़िल्म में होते हैं, तो सामान्य से कुछ अलग देखने की उम्मीद ख़ुद-ब-ख़ुद पैदा हो जाती है । ऐसे में मन में एक और सवाल आता है, आमिर ने ये फ़िल्म क्यों की ? क्या लाश की तलाश करने के लिए ?

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